+ द्वैत ही संसार और अद्वैत ही मोक्ष -
निश्चयेन तदेकत्व,-मद्वैतममृतं परम् ।
द्वितीयेन कृतं द्वैतं, संसृतिर्व्यवहारतः ॥32॥
एकत्वमय अद्वैत ही है, मोक्ष निश्चय से अहो !
कर्मकृत जो द्वैत वह, संसार है व्यवहार से॥
अन्वयार्थ : निश्चयनय से तो एकतारूप जो अद्वैत है, वही मोक्ष है और व्यवहारनय से कर्मों के द्वारा किया हुआ जो द्वैत है, वह संसार है ।