
बन्धमोक्षौ रतिद्वेषौ, कर्मात्मनौ शुभाशुभौ ।
इति द्वैताश्रिता बुद्धि,-रसिद्धिरभिधीयते ॥33॥
शुभ-अशुभ राग-द्वेष बन्धन-मुक्ति आत्मा-कर्म के ।
द्वैत-आश्रित बुद्धि से, नहिं सिद्धि होती इष्ट की॥
अन्वयार्थ : बन्ध-मोक्ष, राग-द्वेष, कर्म-आत्मा, शुभ-अशुभ - इस प्रकार द्वैत से सहित जो बुद्धि है, वह असिद्धि है अर्थात् निजानन्द शुद्ध अद्वैतस्वरूप को रोकने वाली है ।