+ मेघों के आकारों से अविकृत आकाश के समान कर्मों से अविकृत आत्मा -
क्रोधादिकर्मयोगेऽपि, निर्विकारं परं महः ।
विकारकारिभिर्मेघै:, न विकारि नभो भवेत् ॥35॥
क्रोधादि कर्म-संयोग में भी, निर्विकारी आत्मा ।
विकारकारक मेघ हों पर, निर्विकारी नभ सदा॥
अन्वयार्थ : काले-पीले-नीले घोड़े के आकार, हाथी के आकार इत्यादि अनेक विकार सहित बादलों से जिस प्रकार अमूर्तिक आकाश विμकृत नहीं होता; उसी प्रकार यद्यपि आत्मा के साथ क्रोधादि कर्मों का सम्बन्ध है तो भी आत्मा विकार रहित ही है ।