
बोधेनाऽपि युतिस्तस्य, चैतन्यस्य तु कल्पना ।
सच तच्च तयोरैक्यं, निश्चयेन विभाव्यते ॥37॥
आत्मा है ज्ञानयुत यह, कल्पना चैतन्य में ।
क्योंकि निश्चय गम्य है कि, आत्मा ही ज्ञान है॥
अन्वयार्थ : आत्मा, ज्ञान से सहित है - यह भी चैतन्यस्वरूप आत्मा में कल्पना ही है क्योंकि शुद्धनिश्चयनय से आत्मा और ज्ञान एक ही पदार्थ है - ऐसा अनुभवगोचर है ।