
क्रियाकारकसम्बन्ध,-प्रबन्धोज्झितमूर्ति यत् ।
एवं ज्योतिस्तदेवैकं, शरण्यं मोक्षकांक्षिणाम् ॥38॥
कारक-क्रिया सम्बन्ध से भी, भिन्न चेतन तेज है ।
मोक्षाभिलाषी भव्य को यह, आत्मा ही शरण है॥
अन्वयार्थ : जो चैतन्यरूपी तेज, क्रिया और कारक के सम्बन्ध की रचना से रहित है, वही एक मोक्षाभिलाषी भव्य जीवों को परम शरण है ।