
तदेकं परमं ज्ञानं, तदेकं शुचि दर्शनम् ।
चारित्रं च तदेकं स्यात्, तदेकं निर्मलं तपः ॥39॥
यह आत्मा ही ज्ञान है यह, एक ही दर्शन अहा !
चारित्र भी यह आत्मा, तप एक यह निर्मल कहा॥
अन्वयार्थ : चैतन्यस्वरूप शुद्ध आत्मा ही तो ज्ञान है, वही दर्शन है, वही चारित्र है और वही तप है; किन्तु उस शुद्धात्मा से भिन्न न कोई ज्ञान है, न कोई दर्शन है, न कोई चारित्र है और न कोई तप ही है । इसलिए भव्य जीवों को आत्मा का ही ज्ञान, श्रद्धान, आचरण आदि करना चाहिए ।