+ चैतन्यस्वरूप आत्मा ही नमस्कार करने योग्य -
नमस्यं च तदेवैकं, तदेवैकं च मङ्गलम् ।
उत्तमं च तदेवैकं, तदेव शरणं सताम् ॥40॥
वन्दना के योग्य है यह, एक ही मंगल अहो !
वह एक ही उत्तम अत:, बुध शरण इसकी ही गहो॥
अन्वयार्थ : वह एक चैतन्यस्वरूप आत्मा ही नमस्कार करने योग्य है, वही मंगलस्वरूप है, वही सर्व पदार्थों में श्रेष्ठ है तथा वही भव्य जीवों को शरण है ।