
आचारश्च तदेवैकं तदेवावश्यक-क्रिया ।
स्वाध्यायस्तु तदेवैकमप्रमत्तस्य योगिनः ॥41॥
यह आत्मा ही आचरण, यह एक आवश्यक क्रिया ।
स्वाध्याय है यह एक ही, अप्रमत्त योगीश्वरों का॥
अन्वयार्थ : प्रमाद रहित योगीश्वरों को जो चिदानन्दस्वरूप आत्मा का ध्यान है, वही आचार है, वही आवश्यक क्रिया है, वही स्वाध्याय है, किन्तु उससे भिन्न आचार आदि कोई वस्तु नहीं है ।