+ चौरासी लाख उत्तरगुणों का धारी कौन? -
गुणाःशीलानि सर्वाणि, धर्मश्चाऽत्यन्तनिर्मलः ।
सम्भाव्यन्ते परं ज्योति:, तदेकमनुतिष्ठतः ॥42॥
गुण शील एवं धर्म निर्मल, की उसे सम्भावना ।
उत्कृष्ट चेतन ज्योति में ही, लीन रहता जो सदा॥
अन्वयार्थ : जो पुरुष, उस चैतन्यस्वरूप आत्मा का ध्यान करने वाला है, वही पुरुष चौरासी लाख उत्तर गुणों का धारी है, वही अठारह हजार शील व्रतों का धारी है और उसी पुरुष के निर्मल धर्म है - ऐसा निश्चय है ।