
तदेवैकं परं तत्त्वं, तदेवैकं परं पदम् ।
भव्याऽराध्यं तदेवैकं, तदेवैकं परं महः ॥44॥
यह आत्मा ही तत्त्व उत्तम, यही उत्तम पद अहो !
आराध्य भव्यों के लिए यह, एक उत्तम तेज है॥
अन्वयार्थ : वह चैतन्यस्वरूप आत्मा ही एक उत्तम तत्त्व है, वही एक उत्कृष्ट स्थान है, वही एक भव्य जीवों के आराधन करने योग्य है तथा वही एक अद्वितीय उत्तम तेज है ।