+ ध्यानयुक्त योगियों का प्रयोजन -
शस्त्रं जन्मतरुच्छेदि, तदेवैकं सतां मतम् ।
योगिनां योगनिष्ठानां, तदेवैकं प्रयोजनम् ॥45॥
जन्म-तरु-छेदक यही है, एक बुधजन मानते ।
यह है प्रयोजन योगियों का, योग में जो निष्ठ है॥
अन्वयार्थ : वह चैतन्यस्वरूपी आत्मा ही जन्मरूपी वृक्ष का नाश करने के लिए शस्त्र के समान है अर्थात् चैतन्यस्वरूपी आत्मा का भलीभाँति ध्यान करने से सर्व जन्म-मरण आदि दोष नष्ट हो जाते हैं; वह आत्मारूपी तेज ही भव्य जीवों को मान्य है और वही ध्यानयुक्त योगियों का प्रयोजन है अर्थात् उसी की प्राप्ति के लिए योगीगण सदा प्रयत्न करते रहते हैं ।