
मुमुक्षुणां तदेवैकं, मुक्ते: पन्था न चाऽपरः ।
आनन्दोऽपि न चान्यत्र, तद्विहाय विभाव्यते ॥46॥
मोक्षाभिलाषी के लिए यह, एक ही शिवपन्थ है ।
आनन्दमय भी है वही, अन्यत्र भासित हो नहीं॥
अन्वयार्थ : मोक्षाभिलाषियों के लिए चैतन्यस्वरूप आत्मा ही मोक्ष का मार्ग है । आत्मा से अन्य कोई भी मोक्षमार्ग नहीं है । आनन्द भी आत्मा में ही है, किन्तु उसके सिवाय और कहीं पर भी आनन्द प्रतीत नहीं होता । इसलिए भव्य जीवों को इसी का ध्यान करना चाहिए ।