+ चैतन्यस्वरूप आत्मा ही शीतल गृह -
संसारघोरघर्मेण, सदा तप्तस्य देहिनः ।
यन्त्रधारागृहं शान्तं, तदेव हिमशीतलम् ॥47॥
संसाररूपी धूप में, सन्तप्त प्राणी के लिए ।
शान्त शीतल हिम समान, फुहारयुत यह सदन है॥
अन्वयार्थ : संसाररूपी प्रबल सन्ताप से सदाकाल सन्तप्त प्राणियों को वह चैतन्यस्वरूप आत्मा ही शान्त तथा बर्फ के समान शीतल फव्वारे सहित मकान है अर्थात् जिस प्रकार धूप से सन्तप्त मनुष्यों को फव्वारे सहित शीतल मकान में आराम मिलता है; उसी प्रकार संसार के सन्ताप से खिन्न जीवों को इस शान्त आत्मा में लीन होने से ही आराम मिलता है । इसलिए भव्य जीवों को सदा चैतन्यस्वरूप आत्मा का ही अनुभव करना चाहिए ।