
तदेवैकं परं दुर्गम,-गम्यं कर्मविद्विषाम् ।
तदेवैतत्तिरस्कार,-कारि सारं निजं बलम् ॥48॥
कर्म-शत्रु के लिए यह, एक है दुर्गम किला ।
आत्मा ही सैन्यबल है, तिरस्कारी कर्म का॥
अन्वयार्थ : वह चैतन्यस्वरूप आत्मा ही एक ऐसा किला है कि जिसमें कर्मरूपी वैरी कदापि प्रवेश नहीं कर सकते तथा उन कर्मरूपी शत्रुओं का अपमान करने वाला वह चैतन्यस्वरूप आत्मा ही एक उत्कृष्ट बल है ।