
तदेव महती विद्या, स्फुरन्मन्त्रस्तदेव हि ।
औषधं तदपि श्रेष्ठं, जन्मव्याधिविनाशनम् ॥49॥
यह आत्मा ही प्रबल विद्या, यही मन्त्र प्रकाशमय ।
श्रेष्ठ औषधि है यही जो, नष्ट करती जन्म भय॥
अन्वयार्थ : वह चैतन्यस्वरूप तेज ही प्रबल विद्या है, वही स्फुरायमान मन्त्र है और समस्त जन्म-जरा आदि को नाश करने वाली, वही एक परम औषधि है ।