
अक्षयस्याऽक्षयाऽऽनन्द,-महाफलभरश्रिय: ।
तदेवैकं परं बीजं, निःश्रेयसलसत्तरो ॥50॥
यह बीज है जिससे मनोहर, वृक्ष की उत्पत्ति हो ।
जिसमें फलें भरपूर आनन्दरूप शाश्वत फल अहो !
अन्वयार्थ : उस शुद्धात्मारूपी तेज से ही अविनाशी तथा अक्षय सुखरूपी उत्तम फल को देने वाले मोक्षरूपी मनोहर वृक्ष की उत्पत्ति होती है क्योंकि वही उसका उत्कृष्ट बीजभूत है ।