+ चैतन्यस्वरूप आत्मा ही तीन लोक का राजा -
तदेवैकं परं विद्धि, त्रैलोक्यगृहनायकम् ।
येनैकेन विना शंके, वसदप्येतदुद्वनम् ॥51॥
यह एक ही त्रिभुवन सदन का, श्रेष्ठ नायक जानिए ।
इसके बिना यह सदन भी, वनवास जैसा मानिए॥
अन्वयार्थ : हे भव्य जीवों! तीन लोकरूपी घर का स्वामी, उस चैतन्यस्वरूप तेज को ही तुम समझो क्योंकि मैं ऐसी शंका करता हूँ कि उस एक चैतन्यस्वरूप तेज के बिना यह तीन लोकरूपी घर भी वन के समान है ।