
शुद्धं यदेव चैतन्यं, तदेवाऽहं न संशय: ।
कल्पनयाऽनयाप्येतद्धीनमाऽऽनन्दमन्दिरम् ॥52॥
जो शुद्ध चेतन है वही मैं, नहीं संशय है कहीं ।
'आनन्दमय हूँ मैं' अरे! यह कल्पना भी मैं नहीं॥
अन्वयार्थ : 'जो निराकार निरंजन शुद्ध चिद्रूप है सो मैं ही हूँ,' इसमें किसी प्रकार का संशय नहीं है । परन्तु इस प्रकार की कल्पना से भी वह आनन्दस्वरूप शुद्धात्मा रहित है ।