
स्पृहा मोक्षेऽपि मोहोत्था, तन्निषेधाय जायते ।
अन्यस्मै तत्कथं शान्ताः, स्पृहयन्ति मुमुक्षव: ॥53॥
मोह से हो मोक्ष-इच्छा, मुक्ति में बाधक अरे !
तो मुक्तिकामी शान्त नर, किस वस्तु की इच्छा करें ?
अन्वयार्थ : मोह के होने पर ही इच्छा होती है । इसलिए यदि मोक्ष के विषय में भी मोह से उत्पन्न हुई इच्छा हो जाए तो वह भी मोक्ष को रोकने वाली हो जाती है; इसलिए शान्त मोक्षाभिलाषी मनुष्य, अन्य पदार्थों की कैसे इच्छा कर सकते हैं?