
अहं चैतन्यमेवैकं, नाऽन्यत्किमपि जातुचित् ।
सम्बन्धोऽपि केनापि, दृढपक्षो ममेदृशः ॥54॥
चैतन्य ही मैं एक हूँ, नहिं भिन्न मैं इससे कहीं ।
पर से नहीं सम्बन्ध कुछ, मन्तव्य दृढ़ मेरा यही॥
अन्वयार्थ : मैं एक चैतन्यस्वरूप ही हूँ, चैतन्य से भिन्न नहीं हूँ और निश्चय से किसी दूसरे पदार्थ के साथ मेरा सम्बन्ध भी नहीं है - यह मेरा प्रबल मन्तव्य है ।