+ ज्ञानीजनों की परिणति -
शरीरादिबहिश्चिन्ता, -चक्रसम्पर्कवर्जितम् ।
विशुद्धाऽत्मस्थितं चित्तं, कुर्वन्नास्ते निरन्तरम् ॥55॥
देहादि बाह्य पदार्थ की, चिन्ता नहीं बुधजन करें ।
निर्मल निजातम में सदा, निज-चित्त को स्थिर करें॥
अन्वयार्थ : ज्ञानीजन, बाह्य शरीरादि पदार्थों की चिन्ता छोड़ कर, राग-द्वेष आदि मलों से रहित निर्मल अपनी आत्मा में ही चित्त को लगाते हैं ।