
एवं सति यदेवाऽस्ति, तदस्तु किमिहाऽपरै: ।
आसाद्यात्मन्निदं तत्त्वं, शान्तो भव सुखी भव ॥56॥
इसलिए जो है वही है, क्या प्रयोजन अन्य से ।
इस आत्मा को प्राप्त कर, तुम शान्त हो अरु सुखी हो॥
अन्वयार्थ : इस प्रकार पूर्वोक्त रीति से आत्मा का चिन्तवन करने से जो होता है सो होवे, अन्य दूसरे-दूसरे विचारों से क्या प्रयोजन है? इस प्रकार वास्तविक स्वरूप को प्राप्त होकर हे आत्मन्! तू शान्त तथा सुखी हो । इस प्रकार ज्ञान, अपनी आत्मा को शिक्षा देता रहता है ।