+ अनन्त संसार-परिभ्रमण को शान्त करने की विधि -
अपारजन्मसन्तान, - पथभ्रान्तिकृतश्रमम् ।
तत्त्वाऽमृतमिदं पीत्वा, नाशयन्तु मनीषिणः ॥57॥
जन्म-सन्तति-पन्थ में जो, श्रम हुआ है भ्रमण से ।
यह तत्त्व-अमृत-पान कर, ज्ञानी विनष्ट करें उसे॥
अन्वयार्थ : हे भव्य पुरुषों! इस कहे हुए चैतन्यामृत का पान करो तथा तुम्हें इस अपार संसार में अनन्त तिर्यंच-नरक आदि पर्यायों में भ्रमण करने से जो खेद हुआ है, उसको शान्त करो ।