अतिसूक्ष्ममतिस्थूल,-मेकं चाऽनेकमेव यत् ।
स्वसंवेद्यमवेद्यं च, यदक्षरमनक्षरम् ॥
अनौपम्यमनिर्देश्य - मप्रमेयमनाकुलम् ।
शून्यं पूर्णं च यन्नित्य,-मनित्यं च प्रचक्ष्यते ॥
निःशरीरं निरालम्बं, निःशब्दं निरुपाधि यत् ।
चिदात्मकं परंज्योति,-रवाङनसगोचरम् ॥
इत्यत्र गहनेऽत्यन्त,-दुर्लक्ष्ये परमात्मनि ।
उच्यते यत्तदाकाशं, प्रत्यालेख्यं विलिख्यते ॥61॥
अति सूक्ष्म भी स्थूल अति यह, एक और अनेक भी ।
अक्षर-अनक्षर है कहा, स्वसंवेद्य अन्-संवेद्य भी॥
वक्तव्य नहिं अनुपम यही, अप्रमेय आकुलता रहित ।
शून्य भी यह पूर्ण भी यह, नित्य और अनित्य भी॥
अशरीर आलम्बन रहित, नि:शब्द निरुपाधि यही ।
चैतन्यमय उत्कृष्ट ज्योति, मन-वचन-गोचर नहीं॥
इस तरह परमात्मा नहिं, दृष्टिगोचर गहन है ।
इसका कथन तो चित्रलेखन, करें ज्यों आकाश में॥
अन्वयार्थ : वह चैतन्यरूपी तेज, अत्यन्त सूक्ष्म और अत्यन्त स्थूल भी है, एक और अनेक भी है, स्वसंवेद्य और अवेद्य भी है, अक्षर और अनक्षर भी है । आत्मा उपमा रहित है, अवक्तव्य है, अप्रमेय है और आकुलता रहित है; वह शून्य भी है, पूर्ण भी है, नित्य भी है और अनित्य भी है । आत्मा शरीर रहित है, आश्रय रहित है, शब्द रहित है, उपाधि रहित है तथा चैतन्यस्वरूप परम तेज का धारी है और न उसको वचनों से ही कह सकते हैं तथा न उसका मन से ही चिन्तवन कर सकते हैं । इस प्रकार यह परमात्मा, अगम्य तथा दृष्टि अगोचर है । इसलिए जिस प्रकार अमूर्तिक आकाश पर चित्र लिखना कठिन है, उसी प्रकार परमात्मा का वर्णन करना भी अत्यन्त कठिन है ।