
आस्तां तत्र स्थितो यस्तु, चिन्तामात्रपरिग्रह: ।
तस्याऽत्र जीवितं श्लाघ्यं, देवैरपि स पूज्यते ॥62॥
चिन्तन करें भी आत्मा का, लीनता की बात क्या ।
उसका मनुज भव धन्य है, वह सुरगणों से पूज्य है॥
अन्वयार्थ : जो पुरुष, उस शुद्धात्मा में स्थित है, वह तो दूर रहो किन्तु जो पुरुष, इस शुद्धात्मा का चिन्तवन करने वाला है, उसका भी जीवन इस संसार में अत्यन्त प्रशंसनीय है, उसकी बड़े-बड़े देव आकर सेवा-पूजा सेवा करते हैं; इसलिए भव्य जीवों को सदा शुद्धात्मा का ही ध्यान करना चाहिए ।