
सर्वविद्भिरसंसारै:, सम्यग्ज्ञानविलोचनैः ।
एतस्योपासनोपाय:, साम्यमेकमुदाहृतम् ॥63॥
निष्कर्म अरु सर्वज्ञ जिन, कैवल्य-लोचन युक्त जो ।
कहते विधि आराधना की, मात्र समताभाव को॥
अन्वयार्थ : समस्त पदार्थों के जानने वाले, कर्मों से रहित तथा केवलज्ञानरूपी नेत्र के धारी केवली भगवान भी 'इस शुद्धात्मा की उपासना करने का उपाय समता ही है' - ऐसा कहते हैं ।