
नाऽकृतिर्नाऽक्षरं वर्णो,-विकल्पश्च कश्चन ।
शुद्धं चैतन्यमेवैकं, यत्र तत्साम्यमुच्यते ॥65॥
आकार नहिं अक्षर नहीं, नहिं वर्ण कोई विकल्प भी ।
एक ही चैतन्य केवल, है वही बस साम्य ही॥
अन्वयार्थ : जिसमें न कोई आकार है, न कोई अक्षर है, न कोई नीलादि वर्ण है, न जिसमें कोई विकल्प है; किन्तु जिसमें केवल एक चैतन्य ही है, वही साम्य है ।