+ साम्य की सामर्थ्य -
सम्यं शरण्यमित्याहु:, योगिनां योगगोचरम् ।
उपाधि-रचिताऽशेष,-दोषक्षपणकारणम् ॥69॥
योगियों को ध्यान-गोचर, शरण है यह साम्य ही ।
कर्म से उत्पन्न दोष-विनाश का कारण यही॥
अन्वयार्थ : यह साम्य ही समस्त दुःखों को दूर करने में समर्थ है, ध्यानी पुरुष ही इसका ध्यान करते हैं, यह साम्य ही आत्मा और कर्मों के सम्बन्ध से उत्पन्न हुए रागादि दोषों को सर्वथा नष्ट करने वाला है; इसलिए भव्य जीवों को सदा साम्य का ही मनन करना चाहिए ।