+ परम हंस शुद्धात्मा को नमस्कार! -
निःस्पृहायाऽणिमाद्यब्ज,-खण्डे साम्यसरोजुषे ।
हंसाय शुचये मुक्ति,-हंसीदत्तदृशे नमः ॥70॥
वाञ्छा नहीं है ऋद्धि की समता-सरोवर में रमे ।
शिव-हंसिनी पर मुग्ध जो शुचि-हंस उसको नमन है॥
अन्वयार्थ : अणिमा-महिमा आदि कमल-खण्ड (स्वर्ग) की जिसे अंश मात्र भी इच्छा नहीं है, जो समतारूपी सरोवर में सदा प्रीतिपूर्वक रमण करने वाला है, जिसकी दृष्टि मोक्षरूपी हंसिनी में लगी हुई है और जो अत्यन्त पवित्र है - ऐसे परम हंस शुद्धात्मा को नमस्कार है ।