+ ज्ञानियों की दृष्टि में मृत्यु है 'अमृतदायिनी' -
ज्ञानिनोऽमृतसङ्गाय, मृत्युस्तापकरोऽपि सन् ।
आमकुम्भस्य लोकेऽस्मिन्, भवेत् पाकविधिर्यथा ॥71॥
मृत्यु दु:खकर किन्तु ज्ञानी, को प्रदाता मुक्ति की ।
कच्चे घड़े को ताप देकर, पकाते हैं अग्नि में॥
अन्वयार्थ : जिस प्रकार मिट्टी के कच्चे घड़े के लिए पकाने की विधि एक प्रकार से ताप की ही उपजाने वाली है तो भी वह पाकह्नविधि, अमृत (जल) का संगम कराने वाली होती है अर्थात् पक जाने पर वही घड़ा पानी के भरने योग्य होता है; उसी प्रकार यद्यपि बहिरात्माओं को मृत्यु, दुःख की देने वाली है तो भी ज्ञानियों के लिए वह अमृत (मोक्ष) के समागम के लिए ही होती है अर्थात् ज्ञानी पुरुष, सदा मृत्यु का नाश करने के लिए ही प्रयत्न करते रहते हैं तथा चैतन्यस्वरूप से भिन्न ही मृत्यु को मानते हैं, इसलिए मृत्यु के होने पर भी उनको दुःख नहीं होता है ।