
चिदचिद् द्वे परे तत्त्वे, विवेकस्तद्विवेचनम् ।
उपादेयमुपादेयं, हेयं हेयं च कुर्वत: ॥73॥
चेतन-अचेतन तत्त्व दोनों, भिन्न हैं यह जानना ।
ग्राह्य को करना ग्रहण अरु, त्याग करना हेय का॥
अन्वयार्थ : संसार में चेतन तथा अचेतन दो प्रकार के तत्त्व हैं; उनमें ग्रहण करने योग्य को ग्रहण करते तथा त्याग करने योग्य को त्यागने वाले पुरुष का जो यह विचार है, उसी को विवेक कहते हैं ।