+ मूर्ख पुरुषों और विवेकी पुरुषों में अन्तर -
दुःखं किंचित्सुखं किंचित्, चित्ते भाति जडात्मनः ।
संसारेऽत्र पुनर्नित्यं, सर्वं दुःखं विवेकिनः ॥74॥
मूढ़जन को जगत् में कुछ, दु:ख कुछ सुख भासता ।
किन्तु ज्ञानी को जगत् में, सर्व ही दु:ख भासता॥
अन्वयार्थ : मूर्ख पुरुषों को तो इस संसार में कुछ सुख और कुछ दुःख मालूम पड़ता है, किन्तु जो हिताहित के जानने वाले विवेकी हैं, उनको तो इस संसार में सब कुछ निरन्तर दुःख ही दुःख मालूम पड़ता है ।