
यदेव चैतन्यमहं तदेव,
तदेव जानाति तदेव पश्यति ।
तदेव चैकं परमस्ति निश्चयाद्,
गतोऽस्मि भावेन तदेकतां परम् ॥76॥
चैतन्य ही मैं और वह ही, जानता अरु देखता ।
वह एक ही उत्कृष्ट मैं, उससे अभिन्न रहूँ सदा॥
अन्वयार्थ : जो चैतन्य है सो मैं ही हूँ और वही चैतन्य, पदार्थों को जानता और देखता है, वही उत्कृष्ट है तथा निश्चयनय से स्वभाव से मैं और चैतन्य अत्यन्त अभिन्न हूँ ।