
एकत्वसप्ततिरियं सुरसिन्धुरुच्चैः,
श्रीपद्मनन्दिहिमभूधरतः प्रसूता ।
यो गाहते शिवपदाम्बुनिधिं प्रविष्टा-,
मेतां लभेत स नरः परमां विशुद्धिम् ॥77॥
एकत्व सप्ततिरूप सुर-सरिता, अहो! पावन यही ।
श्री पद्मनन्दि महान हिमगिरि से, निकल कर है जो बही॥
मोक्षपद-रूपी उदधि में, मिली यह गंगा अहो !
जो भव्य अवगाहन करें, पायें महान विशुद्धि को॥
अन्वयार्थ : यह 'एकत्व सप्तति' रूपी गंगा नदी, अत्यन्त उन्नत ऐसे श्री पद्मनन्दि नामक हिमालय पर्वत से पैदा हुई है तथा मोक्षरूपी समुद्र में जाकर मिलती है; इसलिए जो भव्य जीव, इस नदी में स्नान करते हैं, उनके समस्त मल नष्ट हो जाते हैं और वे अत्यन्त विशुद्ध होते हैं ।