
संसार-सागर-समुत्तरणैक-सेतु-
मेनं सतां सदुपदेशमुपाश्रितानाम् ।
कुर्यात्पदं मललवोऽपि किमन्तरङ्गे,
सम्यक् समाधिविधिसन्निधिनिस्तरंगे ॥78॥
संसार-सागर पार करने, हेतु यह सेतु कहा ।
जिन सज्जनों ने इस परम, उपदेश का आश्रय लिया॥
उन सज्जनों के चित्त में यह, पापमल का लेश भी ।
सम्यक् समाधि विधान निश्चल, से न रह सकता कभी॥
अन्वयार्थ : जिन सज्जन पुरुषों ने संसार-समुद्र से पार करने में पुल के समान इस उत्तम उपदेश का आश्रय किया है; उन सज्जन पुरुषों के द्वारा उत्तम, क्षोभ रहित आत्मध्यान करने से उनके अन्तरंग में किसी प्रकार का रागादि मल नहीं रह सकता ।