
आत्मा भिन्नस्तदनुगतिमत्कर्म भिन्नं तयोर्या,
प्रत्यासत्तेर्भवति विकृतिः, सापि भिन्ना तथैव ।
कालक्षेत्रप्रमुखमपि यत्तच्च भिन्नं मतं मे,
भिन्नं भिन्नं निजगुणकलालंकृतं सर्वेतत् ॥79॥
यह आत्मा अरु तदनुगामी, कर्म दोनों भिन्न हैं ।
सम्बन्ध से उनके हुई जो, विकृति भी भिन्न है॥
क्षेत्र-कालादिक सभी, परद्रव्य मुझसे भिन्न हैं ।
निज गुण-कलाओं से सुशोभित, वस्तुएँ सब भिन्न हैं॥
अन्वयार्थ : यह ज्ञानस्वरूप मेरा आत्मा भिन्न है, उसके पीछे चलने वाला कर्म भी भिन्न है, कर्म और आत्मा के सम्बन्ध से जो कुछ विकार हुआ है, वह भी मुझसे भिन्न है तथा काल, क्षेत्र आदि जो पदार्थ हैं, वे भी मुझसे भिन्न हैं । इस प्रकार अपनी-अपनी पर्यायों सहित जितने परपदार्थ हैं, वे सर्व मुझसे भिन्न हैं - ऐसे ज्ञानी सदा विचार करता है ।