
येऽभ्यासयन्ति कथयन्ति विचारयन्ति,
सम्भावयन्ति च मुहुमुर्हुरात्मतत्त्वम् ।
ते मोक्षमक्षयमनूनमनन्तसौख्यं,
क्षिप्रं प्रयान्ति नवकेवललब्धिरूपम् ॥80॥
जो बारम्बार निजात्म का, अभ्यास करते हैं सदा ।
चिन्तन करें उसका कथन, अरु भावना उसकी सदा ।
नवलब्धि केवल से सुशोभित, सौख्य अक्षय-निधि अहो !
वे प्राप्त करते शीघ्र अविनाशी परम पद मोक्ष को॥
अन्वयार्थ : जो भव्य जीव, इस आत्मतत्त्व का बारम्बार अभ्यास करते हैं, कथन करते हैं, विचार और अनुभव करते हैं; वे भव्य जीव अविनाशी महान तथा क्षायिक सम्यक्त्व, क्षायिक चारित्र, क्षायिक ज्ञान, क्षायिक दर्शन आदि नौ केवललब्धिस्वरूप अनन्त सुख के भण्डार - ऐसे मोक्षपद को बात ही बात में पा लेते हैं; इसलिए भव्य जीवों को सदा इस आत्मतत्त्व का चिन्तवन करना चाहिए ।