
आदाय व्रतमात्मतत्त्वममलं, ज्ञात्वाऽथ गत्वा वनं;
निःशेषामपि मोहकर्मजनितां, हित्वा विकल्पावलिम् ।
ये तिष्ठन्ति मनो रुच्चिदचलैकत्वप्रमोदं गताः;
निष्कम्पा गिरिवज्जयन्ति मुनय:, ते सर्वसङ्गोज्झिताः ॥1॥
निर्मल आत्मस्वरूप जान व्रत-धारण कर वन-गमन करें ।
मोहजन्य सम्पूर्ण विकल्पों, की सन्तति को नष्ट करें॥
मन-मारुत् में रहें, अचल जो, चिदानन्द रस में हैं लीन ।
मेरु समान अकम्प मुनीश्वर, जयवन्तो पर-संग-विहीन॥
अन्वयार्थ : व्रत को ग्रहण कर, निर्मल आत्मा के स्वरूप को जान कर, वन में जाकर, मोहकर्म से पैदा हुए समस्त विकल्पों को नष्ट कर, समस्त प्रकार के परिग्रहों से रहित जो मुनिगण, मनरूपी पवन से चलायमान नहीं होते हैं तथा चैतन्य की एकता में हर्ष सहित विराजमान रहते हैं अर्थात् जो अपनी आत्मा में लीन हंै और पर्वत के समान निश्चल स्थित हैं; वे मुनिगण, सदा इस लोक में जयवन्त रहें ।