
चेतोवृत्तिनिरोधनेन करण,-ग्रामं विधायोद्वसं;
तत्संहृत्य गतागतं च मरुतौ, धैर्यं समाश्रित्य च ।
पर्यंकेन मया शिवाय विधिवछून्यैकभूभृद्दरी-;
मध्यस्थेन कदाचिदर्पितदृशा, स्थातव्यमन्तर्मुखम् ॥2॥
चित्त-वृत्ति को कब रोकूँगा, इन्द्रिय-ग्राम करूँ वश में ।
श्वासोच्छ्वास निरोध करूँगा, महाधैर्य धारण कर मैं॥
निर्जन वन की शून्य गुफा में, पर्यंकासन बैठूँगा ।
दृष्टि समर्पित कर चेतन में, आतम-ध्यान लगाऊँगा॥
अन्वयार्थ : अहो! चित्त की वृत्ति को रोक कर, इन्द्रियों को उजाड़ कर , श्वासोच्छ्वास को रोक कर, धीरता को धारण कर, पर्यंक आसन माँड कर और आनन्दस्वरूप चैतन्य की तरफ दृष्टि लगा कर, निर्जन पर्वत की गुफा में बैठ कर मैं कब आत्मध्यान करूँगा?