+ काष्ठ या पाषाण की मूर्ति के समान ध्यान करने की भावना -
धूलीधूसरितं निमुक्तवसनं, पर्यंकमुद्रागतं;
शान्तं निर्वचनं निमीलितदृशं, तत्त्वोपलम्भे सति ।
उत्कीर्णं दृषदीव मां वनभुवि, भ्रान्तो मृगाणां गणः;
पश्यत्युद्गतविस्मयो यदि तदा, मादृग्जनः पुण्यवान् ॥3॥
आत्मतत्त्व को पाकर जब मैं, धूल-धूसरित हो निर्ग्रन्थ ।
आँख बन्द कर शान्त मौन हो, ध्यान धरूँ पर्यंकासन॥
मूर्ति उकेरी पाषाणों की, वन के मृग सब समझेंगे ।
भ्रम से मुझे तभी मुझ सम नर, पुण्यवान कहलाएँगे॥
अन्वयार्थ : निजस्वरूप की प्राप्ति होने पर, धूलि से मलिन, वस्त्ररहित, पर्यंक मुद्रा सहित, शान्त, वचन रहित तथा आँखों को बन्द किए हुए मुझे जिस समय मृग, वन में भ्रम सहित आश्चर्य से देखेंगे; उसी समय मेरे समान मनुष्य पुण्यवान् समझा जाएगा ।