+ निर्ग्रन्थ मुनिराज के पास घर, वस्त्र, धन, स्त्री, भोजन, मित्र, सुख आदि भी? -
वासः शून्यमठे क्वचिन्निवसनं, नित्यं ककुम्मण्डलं;
सन्तोषो धनमुन्नतं प्रियतमा, क्षान्तिस्तपो भोजनम् ।
मैत्री सर्वशरीरिभिः सह सदा, तत्त्वैकचिन्तासुखं;
चेदास्ते न किमस्ति मे शमवतः, कार्यं न किंचित्परै: ॥4॥
शून्य मठों में हो निवास अरु, दिग्मण्डल हों मेरे वस्त्र ।
सन्तुष्टि धन क्षमा प्रियतमा, तप ही हो क्षुत्-नाशक अस्त्र॥
मैत्रीभाव सभी जीवों से, तत्त्वज्ञान का हो आनन्द ।
तो फिर मुझे मिला है सब कुछ, नहीं किसी से प्रयोजन॥
अन्वयार्थ : किसी शून्य मठ में मेरा निवास स्थान है, अविनाशी दिशाओं का समूह मेरा वस्त्र है, सन्तोष धन है, क्षमा स्त्री है, तप भोजन है, समस्त प्राणियों के साथ मित्रता है और आत्मस्वरूप के चिन्तवन का सुख है तो मेरे लिए सर्व ही वस्तुएँ मौजूद हैं, तो फिर मुझे दूसरी वस्तुओं से क्या प्रयोजन है? - ऐसा योगीश्वर सदा विचार करते रहते हैं ।