+ सुवर्णमयी घर के ऊपर मणिमयी कलश की स्थापना करने वाला कौन? -
लब्ध्वा जन्मकुले शुचौ वरवपु:, बुद्ध्वा श्रुतं पुण्यतो;
वैराग्यञ्च करोति यः शुचितपो, लोके स एकः कृती ।
तेनैवोज्झितगौरवेण यदि वा, ध्यानाऽमृतं पीयते;
प्रासादे कलशस्तदा मणिमयो, हैमे समारोपित: ॥5॥
पुण्योदय से नरभव सुन्दर, रोग-रहित तन श्रुत-अभ्यास ।
पाकर जो वैराग्य करे तप, वह माना जाता बड़भाग॥
किन्तु यदि वह मान-त्याग कर, ध्यानामृत का पान करे ।
तो वह नरभव स्वर्ण-सदन पर, सुन्दर मणिमय कलश धरे॥
अन्वयार्थ : जो मनुष्य, इस संसार में उत्तम कुल में जन्म पाकर, नीरोग और सुन्दर शरीर को प्राप्त कर, शास्त्र को जान कर और वैराग्य को प्राप्त होकर पवित्र तप को करता है; वह मनुष्य, संसार भर में एक ही पुण्यवान् समझा जाता है और वही तप करने वाला पुरुष, यदि मद रहित होकर ध्यानामृत का आस्वादन करे तो समझना चाहिए कि उस मनुष्य ने सुवर्णयी घर के ऊपर मणिमयी कलश की स्थापना की है ।