+ योगीश्वरों के मार्ग में गमन करने की भावना -
ग्रीष्मे भूधरमस्तकाश्रितशिलां, मूलं तरोः प्रावृषि;
प्रोद्भूते शिशिरे चतुष्पथपदं, प्राप्ताः स्थितिं कुर्वते ।
ये तेषां यमिनां यथोक्ततपसां, ध्यानप्रशान्तात्मनां;
मार्गे सञ्चरतो मम प्रशमिन:, काल: कदा यास्यति ॥6॥
ग्रीष्म ऋतु में गिरि-शिखरों पर, वर्षा में जो वृक्ष तले ।
शीत काल में खुली जगह पर, जो थिर आसन में बैठें॥
इस प्रकार तप करने से जो, योगीश्वर गण हुए प्रशान्त ।
उनके पथ पर गमन हेतु कब, प्राप्त करूँगा मैं शुभ काल ?
अन्वयार्थ : जो योगीश्वर, ग्रीष्म ॠतु में पहाड़ों के अग्र भाग में स्थित शिला के ऊपर ध्यान-रस में लीन रहते हैं, वर्षा काल में वृक्षों के मूल में बैठकर औेर शरद ॠतु में चौड़े मैदान में बैठ कर ध्यान लगाते हैं; उन शास्त्र के अनुसार तप के धारी तथा ध्यान से जिनकी आत्मा प्रशान्त हो गई है - ऐसे योगीश्वरों के मार्ग में गमन करने का मुझे भी कब समय मिलेगा?