
भेदज्ञानविशेषसंहृतमनो,-वृत्ति: समाधिः परो;
जायेताद्भुतधामधन्यशमिनां, केषांचिदत्राऽचलः ।
वजे्र मूर्ध्नि पतत्यपि त्रिभुवने, वह्निप्रदीप्तेऽपि वा;
येषां नो विकृतिर्मनागपि भवेत्, प्राणेषु नश्यत्स्वपि ॥7॥
वज्रपात हो यदि मस्तक पर, या त्रिभुवन में अग्नि जले ।
अथवा प्राण नष्ट होते हों, किन्तु जरा भी मन न चले॥
ऐसी अद्भुत परम समाधि, धन्य मुनीश्वर को होती ।
भेदज्ञान से जिनके मन की, वृत्ति संकुचित हो जाती॥
अन्वयार्थ : जिस समाधि के कारण मस्तक पर वज्र गिरने पर, तीनों लोक के जलने पर और निज प्राणों के नष्ट होने पर भी उन मुनियों के मन को किसी प्रकार का विकार नहीं होता । स्व-पर के भेदज्ञान से समाधि में जिनके मन की वृत्ति संकुचित है, आश्चर्यकारी है, उत्कृष्ट और अचल है - ऐसी वह समाधि, उन धन्य तथा साम्यभाव के धारक मुनियों को होती है ।