
सम्पूर्णदेशभेदाभ्यां, स च धर्मो द्विधा भवेत् ।
आद्ये भेदे च निर्ग्रन्थाः, द्वितीये गृहिण:स्थिता ॥4॥
सकल एवं एकदेश दो हैं धर्म के ।
निर्ग्रन्थ धारें प्रथम, एवं इतर श्रावक धारते॥
अन्वयार्थ : यह रत्नत्रयात्मक धर्म, सर्वदेश तथा एकदेश के भेद से दो प्रकार का है; उसमें सर्वदेशधर्म तो निर्ग्रन्थ मुनि पालन करते हैं और एकदेशधर्म का पालन गृहस्थ करते हैं ।