
सम्प्रत्यपि प्रवर्तेत, धर्मस्तेनैव वर्त्मना ।
तेन तेऽपि च गण्यन्ते, गृहस्थाः धर्महेतवः ॥5॥
भेद-द्वय से आज भी है, धर्म का वर्तन अहो !
इसलिए गेही जनों को, धर्म का कारण कहें॥
अन्वयार्थ : इस काल में भी उस धर्म की उसी मार्ग से अर्थात् सर्वदेश तथा एकदेश मार्ग से ही प्रवृत्ति है, इसलिए उस धर्म के कारण गृहस्थ भी माने जाते हैं ।