
सम्प्रत्यत्र कलौ काले, जिनगेहो मुनिस्थितिः ।
धर्मश्च दानमित्येषां, श्रावका मूलकारणम् ॥6॥
श्रावक बनाते जिनालय, मुनि-धर्म की स्थिति करें ।
दान भी देते अत: वे, मूल हैं कलिकाल में॥
अन्वयार्थ : इस काल में श्रावक बड़े-बड़े जिन मन्दिर बनवाते हैं, आहार देकर मुनियों के शरीर की स्थिति करते हैं, जिससे सर्वदेश और एकदेशरूप धर्म की प्रवृत्ति होती है तथा दान की प्रवृत्ति होती है; इसलिए इन सबके मूल कारण श्रावक ही हैं, अतः श्रावकधर्म भी अत्यन्त उत्कृष्ट है ।