
सामायिकं न जायेत, व्यसनम्लानचेतसः ।
श्रावकेन तत: साक्षात्, याज्यं व्यसनसप्तकम् ॥9॥
जिसका व्यसन से मलिन मन है, नहीं सामायिक उसे ।
श्रावकों को इसलिए ये, व्यसन तजना चाहिए॥
अन्वयार्थ : जिन मनुष्यों का चित्त, व्यसनों में मलिन हो रहा है, उनके द्वारा कदापि यह सामायिक व्रत नहीं हो सकता; इसलिए सामायिक के आकांक्षी श्रावकों को सप्त व्यसनों का सर्वथा त्याग कर देना चाहिए ।