
धर्मार्थिनोऽपि लोकस्य, चेदस्ति व्यसनाश्रय: ।
जायते न ततः सापि, धर्मान्वेषणयोग्यता ॥11॥
धर्माभिलाषी पुरुष भी यदि व्यसन-ग्रस्त रहें जरा ।
तो धर्म को पहिचानने की नहीं उनमें पात्रता॥
अन्वयार्थ : जो पुरुष, धर्म का अभिलाषी है, यदि उसके भी ये व्यसन होवें तो उस पुरुष में धर्म-धारण करने की योग्यता कदापि नहीं हो सकती अर्थात् वह धर्म की परीक्षा करने का पात्र ही नहीं हो सकता; अत: धर्मार्थी पुरुषों को अवश्य ही व्यसनों का त्याग करना चाहिए ।