+ देव-पूजन-स्तवन की महिमा -
प्रपश्यन्ति जिनं भक्त्या, पूजयन्ति स्तुवन्ति ये ।
ते च दृश्याश्च पूज्याश्च, स्तुत्याश्च भुवनत्रये ॥14॥
भक्ति से जिन-दर्श-पूजन, और जो स्तवन करें ।
वे दर्श्य, पूज्य, स्तुत्य होते, भव्यजन त्रय लोक में॥
अन्वयार्थ : जो भव्य जीव, जिनेन्द्र भगवान को भक्तिपूर्वक देखते हैं, उनकी पूजा-स्तुति करते हैं; वे भव्य जीव, तीन लोक में दर्शनीय तथा पूजा के योग्य होते हैं (सर्व लोक उनको भक्ति से देखते हैं तथा उनकी पूजा-स्तुति करते हैं)